ख़ामोश हो गये योगेश दा—पारो

ख़ामोश हो गये योगेश दा—पारो

पारो शैवलिनी
“कहो पारो कैसे हो। भाभी कैसी है। बच्चे कैसे हैं।” कितनी आत्मीयता थी उनके इस संबोधन में। मैं जब भी उन्हें फोन करता योगेश दा इन्हीं शब्दों से बात शुरू करते थे। अब कभी उनके ये शब्द मेरे कान में नहीं पड़ेंगे। तरसता छोड़ गये सबको, मुझे भी। उनका मधुवन सूना हो गया। मेरे लिए भी।
1994 में पहली बार मैं उनसे संगीतकार रोबिन बनर्जी के साथ मुंबई के गोरेगांव वेस्ट में उनके मधुवन में मिला था।उसके 21 साल बाद दूसरी बार 2014 में मिला। उसी आत्मीयता से मिले। लगा ही नहीं मुझे कि इतने वर्षों बाद मिल रहा हूं। हां फोन से बराबर मुलाकात होती रहती थी।
1958 में योगेश दा लखनऊ से मुंबई आये। काफी थपेडों के बाद एक्टर भगवान दास ने उन्हें संगीतकार रोबिन बनर्जी से मिलवाया। संगीतकार की तीन फिल्में वज़ीर-ए-आलम, इन्साफ कहाँ है तथा मासूम के गाने काफी मकबूल हुए थे।चौथी फ़िल्म सखी रोबिन पर काम रहे थे वो। योगेश को पहली बार रोबिन बनर्जी ने मौका दिया इसी फ़िल्म में। योगेश का पहला गाना संगीतकार ने मन्ना डे और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में रिकॉर्ड किया–“तुम जो आओ तो प्यार आ जाये,ज़िन्दगी में बहार आ जाये”–काफी हिट रही। आज भी विविध भारती रेडियो पर खूब बजती है ये गाना।
सखी, रोबिन के बाद दस-बारह फिल्मों में गीत-संगीत की इस जोड़ी ने शंकर जयकिशन-शैलेन्द्र,लक्ष्मीकांत प्यारेलाल-आनंद बक्सी,नौशाद-शकील,रवि-साहिर की जोड़ी की तरह हिट रहे।मारवेल मैन,रोकेट टारजन,रूस्तम कौन,हुश्न का गूलाम,जंगली राजा,तुफानमेल की वापसी,हुकुम का एक्का जैसी स्टंट फिल्मों के लिए योगेश ने गाने लिखे।
संगीतकार नौशाद को छोड़कर तकरीबन सभी संगीतकारों के लिए योगेश ने एक से बढ़कर एक गाने लिखे।रोबिन बनर्जी के बाद योगेश की जोड़ी सलिल चौधरी के साथ जमी।योगेश दा ने एकबार कहा था –“रोबिन बनर्जी ने हिंदी सिने जगत से मेरा परिचय करवाया जबकि सलिल दा ने मुझे लोकप्रियता का मजा चखाया।”
हाल में प्रदर्शित अंग्रेज़ी में कहते हैं फ़िल्म में योगेश दा का लिखा प्रवीण कुंवर के संगीत में सत्येंद्र का गाया एक ठुमरी आजकल विविध भारती पर खूब बज रहा है।
संगीत के इस त्रिमूर्ति का रचा एक गीत–“ज़िन्दगी एकबार फ़िर मिलना,इसबार तो तुम्हें कह भी ना सका अपना।जिन्दगी एकबार फिर मिलना।”
काश ! ईश्वर योगेश दा को एकबार फिर से ज़िन्दगी दे दे—
शत् शत् नमन मेरे प्रिय गीतकार योगेश दा को।

(लेख वरिष्ठ पत्रकार सह साहित्यकार पारो शैवलिनी के हैंं)

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