कर्ण का पुर्नआगमन

इतिहास

श्रीमती रिंकु रंजन जायसवाल

दानवीर कर्ण की भूमि अंग प्रदेश करोड़ों वर्षों से उनकी दानशीलता की कहानी कहते आ रही है। सवा मन सोना प्रतिदिन दान करने का आख्यान शास्त्रों व कहानियों में वर्णित है। आज उस दानवीर कर्ण का गढ़ (मुंगेर का कर्ण चौरा) योगआश्रम में तबदील हो गया। कहते हैं दानवीर कर्ण प्रकांड विद्वान व राजकौशल से परिपूर्ण थे।

इसी अंग प्रदेश में कर्ण का पुर्नआगमन भी माना जाता है। पुर्नआगमण की कहानी 26 जनवरी 1875 से शुरू होती है। जो दीप बाबू के नाम से प्रसिद्ध है। दीप बाबू का जन्म भागलपुर के सम्पन्न जमींदार, शिक्षानुरागी और ओजस्विता से भरपूर जायसवाल (कलवार) जाति के तेजनारायण सिंह के घर हुआ। तेजनारायण सिंह में उक्त गुणों के अलावा परोपकारी, अग्रणी कोटि के स्वतंत्रता सेनानी जैसे सदगुण हृदय में समाये हुआ था। लेकिन आज तक इनकी उपेक्षा होती रही। आखिर क्यों? यदि तहखाने में झांककर देखे तो बस एक ही कारण दिखेगा। वह है पिछड़ा वर्ग का होना। उसमें भी वैश्य कोटि से। दुर्भाग्य है बिहार का जहां जाति देखकर गुणवानों का गुणगान किया जाता है। चाहे सरकार किसी की भी रही हो।

पिता तेज नारायण सिंह के सद्गुण का प्रभाव बाबू दीप नारायण सिंह पर भी पड़ी। इनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा कोलकत्ता के एक अंग्रेजी स्कूल में हुयी। इसके बाद सेंट जेवियर्स कॉलेज में और 16 वर्ष की अल्पायु में दीप बाबू उच्च शिक्षा के लिए लंदन भेज दिये गये। यहां से बैरिस्टरी पास किये और यहीं के अदालत में उनका निबंधन भी हो गया। लेकिन उन्होंने प्रैक्टिस नहीं की।देश के प्रति सेवा की भावना उनके हृदय में कूट-कूट कर भरी पड़ी थी। सो उन्हें विदेशों में काम करना नागवार लगा।यहीं पर आखिरी बार उन पर देश प्रेम सवार हुआ और वे लंदन से भारत लौट आये।

इस समय अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई तेज थी। सो दीप बाबू भारत वापस आने के बाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के आधार स्तंभ दादा भाई नैरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, डा.राजेन्द्र प्रसाद, मजहरूल हक आदि के साथ हो लिए और अंग्रेजों से लोहा लेने लगे। इन वरिष्ठ नेताओं के साथ कंधा से कंधा मिला कर देश की राजनीत और समाज को अपने विचारों तथा कार्यों से प्रभावित करने वाले दीप बाबू भारत के उन थोड़े से विभूतियों में एक हैं। जिन्होंने अपनी जिंदगी, अपनी सम्पत्ति, अपना सर्वस्व बिना किसी स्वार्थ के देश की जनता को अर्पित कर दिया।

दीप बाबू के पिता तेज नारायण सिंह द्वारा स्थापित टी.एन.जुबली कॉलेज को उन्होंने भरपूर वित्तीय सहायता प्रदान की और वे इस कॉलेज के आजीवन संरक्षक बने रहे।यही कॉलेज आज टी.एन.बी.कॉलेज है। इसी प्रकार टी.एन.जुबली कॉलेजिएट स्कूल व टी.एन.जुबली लॉ कॉलेज को भी इन्होंने भरपूर वित्तीय सहायता दी। जिसे पिता तेज नारायण सिंह ने स्थापित किया था (लेकिन 1956 में कोर्ट के एक फैसले से जुबली के बदले बनैली अंकित किया गया)। इसके अलावा मोक्षदा बालिका विद्यालय को शुचारू रूप से संचालन के लिए ट्रस्ट बनाकर वित्तीय सहायता प्रदान किया। गुरूकुल स्कूल की स्थापना की। दीप बाबू कितने ओजस्वी व भविष्य के जानकार थे कि जिन बातों के लिए सरकार आज प्रयास कर रही है, इन सब की स्थापना उन्होंने आजादी से पहले ही कर दिया। विधवाओं की पीड़ा से पीडि़त व द्रवित हो उन्होंने विधवा आश्रम की स्थापना कर भरपूर सम्पत्ति दान दी और सफलतापूर्वक संचालित होने के लिए ट्रस्ट बना दी। अनाथ बच्चों के लिए अनाथालय की स्थापना की। यह अनाथालय प्रथम पत्नी रामानन्दी देवी के नाम पर नाथनगर स्टेशन के सामने है, इसमें आज भी अनाथ बच्चों की परवरिश होती है। वर्तमान के पोलिटेकनिक कॉलेज की स्थापना दुसरी पत्नी लीला सिंह के याद में-लीला दीप नारायण सिंह तकनिकी स्कूल के रूप में की। आर्य समाज के विस्तार व स्थापना के लिए भागलपुर में जमीन दान दी। अपने आवास के सामने के पार्क को सार्वजनिक मैदान के रूप में दान कर दिया, जो आज लाजपत पार्क के रूप में शहर का गौरव बना हुआ है। दीप बाबू का निवास स्थान आजके जिला जज का आवास बना हुआ है। 1934 के भूकम्प पीडि़तों के बीच लाखों रूपये का सहयोग दिया।साथ ही सभी संस्थाओं के लिए ट्रस्ट बनाया ताकि सभी संस्थायें सही रूप में संचालित हो सके। इसके अलावा भागलपुर में कृषि के विकास व अन्य तकनीकि शिक्षा के प्रचार प्रसार में खुलकर दिलचस्पी ली। तब उनका सलाना आय 1928 ई0 में 5,47,500रू आंकी गयी थी।जो आज के हिसाब से कई अरबों में होगी। लेकिन ये सारी संपत्ति देश व समाज हित में ट्रस्ट बना दान में दे दी। ये ऐसे दानवीर थे जिन्होनें अपने आवास को भी दान कर दिये। आजादी के पुर्व दीपबाबू जो कर गये उस पर बिहार वासियों को गर्व है। लेकिन आजादी के बाद से आज तक किसी ने सरकार से यह बात नहीं कही कि दीप बाबू के आवास को खाली करा कर स्मृति संग्रहालय बनाया जाय। पुर्णजन्मित कर्ण ‘दीप बाबू’ का आवास आज दानशीलता पर रो रहा है। एक तरफ दानवीर कर्ण का गढ़ योग आश्रम में तबदील हो गया तो दुसरी ओर दीप बाबू का आवास जिला जज का आवास बना दिया गया।

दीप बाबू के शहर में एक सड़क का नाम दीपनारायण सिंह पथ किया गया था, जो आज डी.एन.सिंह के रूप में जाना जाता है। इतने बड़े दानी की एक अदद् आदम कद प्रतिमा के लिए भागलपुर तरस रहा था। लेकिन अपने शहर के लिए हर हमेशा चिंतन व संघर्ष करने वाले कमल जायसवाल ने इस बात के लिए संघर्ष किया और दीप बाबू की आदम कद प्रतिमा शहर के हृदय स्थली घंटा घर परिसर में स्थापित करवा कर शहर को एक नया स्वरूप दिया और शहर वासियों को एक तोहफा।

अनेक ख्याति प्राप्त नेताओं के साथ कंधा से कंधा मिलाकर देश की राजनीति और समाज को अपने विचारों व कार्यों से प्रभावित करने वाले दीप नारायण सिंह की यादें आज धूमिल पड़ती जा रही है। एक समय देश,विशेष कर बिहार की शिक्षा संस्कृति एवं राजनीति के प्रति समर्पित नायक की छवि किताब के कुछ पन्नों व विश्वविद्यालय के शोधों तक सिमट कर रह गयी है। वस्तुतः भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में एक अलग तरीके से उच्च स्तरीय भूमिका निभाने वाले इस व्यक्तित्व के साथ इतिहास भी न्याय नहीं कर सकी है।

दीप बाबू-एक नजर

जन्म: 1875-26 जनवरी

निधन: 1935-29नवम्बर

पिता-तेज नारायण सिंह

जन्म स्थान-भागलपुर

प्रारंभिक शिक्षा- कलकत्ता के अंग्रेजी स्कूल में।

1888-13 वर्ष की अल्पायु में कांग्रेस के चौथे अधिवेशन इलाहाबाद में शामिल।

1891-उच्च शिक्षा के लिए लंदन भेजे गये।

1897-कैम्ब्रिज एवं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण की और वैरिस्टरी पास

की। इसी वर्ष स्वदेश लौट आये।

विवाह-   रामानन्दी देवी से हुई। कुछ ही दिनों में पत्नी की मृत्यु के उपरान्त लीला सिंह से

विवाह हुयी और यहीं से दीप बाबू सामाजिक व राजनीतिक जीवन में कदम रखते

हैं।

1901-बंगाल प्रान्तीय सम्मेलन का भागलपुर में अध्यक्षता।

1905-बंगाल विभाजन का विरोध एवं स्वदेशी आन्दोलन के प्रचार में भागलपुर का नेतृत्व।

1906-बिहारी स्टूडेन्ट कान्फ्रेंस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका।

 

1908-बिहार कांग्रेस कमिटी की स्थापना के प्रेरक एवं सक्रीय सदस्य।

1906 से 1910-बिहार के प्रायः सभी प्रान्तीय सम्मेलनों की अध्यक्षता।

1910-बंगाल विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित।

1911-दिल्ली दरवार में भाग लिया।

1917-बिहार एवं उडि़सा कमिटी तथा बिहार प्रान्तीय एसोसिएसन के सदस्य निर्वाचित।

1920-गांधी के भागलपुर यात्रा की अगुआई। असहयोग आन्दोलन में भागलपुर के छात्रों का

नेतृत्व, खिलाफत का नेतृत्व, सद्भाव का प्रचार, सरकार विरोधी आन्दोलन का सफल

नेतृत्व, बिहार संगठन समिति के प्रमुख सदस्य मनोनित, तिलक स्वराज फंड के

लिए एक लाख रूपये की व्यवस्था।

1921-किसान आन्दोलन की पुर्णियां में अगुआई।

1922-1923-किसान संगठन की मुंगेर में स्थापना।

1924-नारी अधिकारों का समर्थन, पत्नी लीला सिंह को प्रोत्साहन, लीला सिंह द्वारा रिफार्म एन्क्वायरी कमिटी में महिलाओं का प्रतिनिधित्व।

1928-बिहार प्रांतीय कांग्रेस कमिटी के 17 वें अधिवेशन में ध्वजारोहन।

1929-सरदार बल्लभ भाई पटेल को बिहार किसान आन्दोलन के नेतृत्व में सहयोग।

1930-भागलपुर नगरपालिका के अध्यक्ष मनोनित,सविनय अवज्ञा आन्दोलन में बिहार में राजेन्द्र बाबू की गिरफ्तारी के बाद आन्दोलन के नेतृत्व का भार ग्रहण। 26 जनवरी 1930 को पटल बाबू के आहाते  में राष्टीय झंडे का ध्वजारोहण,जेल यात्रा।

1934-भूकम्प पीडि़तों के बीच कार्य, गांधी जी के भागलपुर यात्रा की व्यवस्था।बिहार सेन्टल

रीलिफ कमिटी के सदस्य।

1935-अखिल भारतीय स्वदेशी उद्योग प्रदर्शनी का संचालन।

 

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