राष्ट्रीय अस्मिता का बोध कराएं साहित्यकार

साहित्य

साहित्यकार महज कविता लेखन तक सीमित न रहें, साहित्य के जरिए देशवासियों को राष्ट्रीय अस्मिता का भी बोध कराएं। ये समय की मांग भी है।

आगरा। साहित्यकार महज कविता लेखन तक सीमित न रहें, साहित्य के जरिए देशवासियों को राष्ट्रीय अस्मिता का भी बोध कराएं। ये समय की मांग भी है। क्योंकि राष्ट्रीय अस्मिता का भाव राष्ट्रीय बोध का जागरण करता है। ये विचार रविवार को केंद्रीय ¨हदी संस्थान और संस्कार भारती के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय ‘साहित्य सृजन से राष्ट्र अर्चन’ विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन साहित्यकारों ने व्यक्त किए। संगोष्ठी में भारतीय भाषाओं में राष्ट्रीय भाव, कलाओं के संवर्धन में साहित्यकार की भूमिका पर भी मंथन हुआ।

 

अटल बिहारी वाजपेयी सभागार में शुरू हुई संगोष्ठी में संस्कार भारती के अखिल भारतीय सह महामंत्री रविंद्र भारती ने कहा कि राष्ट्रीय बोध जागरूक लोगों का धर्म है। राष्ट्र अर्चन के लिए आज के रचनाकारों को मानव केंद्रित राष्ट्रीय चेतना व्यक्त करनी होगी। आज हम बाजार पर वर्चस्व स्थापित करने की अंधी दौड़ में शामिल हैं। इसे वस्तुपरक और यथार्थ दृष्टि से साहित्यकारों को परखना होगा। अपनी प्राथमिकताएं पहचाननी होंगी और सांस्कृतिक विशिष्टता के साथ उसमें संतुलन साधना होगा। निज राष्ट्रधर्मिता कायम रखते हुए वैश्विक चेतना को समझा जाए, उसमें राष्ट्र की पीड़ा भी व्यक्त की जाए।

वोट बैंक की राजनीति ने किया राष्ट्रीयता का क्षरण- केएमआइ के पूर्व निदेशक डॉ. जयसिंह नीरद ने कहा कि हम और आप एक विचित्र समय में खड़े हैं। आज व्यक्ति अपने लिए जी रहा है। राष्ट्र की बात तो दूर, हम अपने मोहल्ला, समाज व प्रात के नहीं हैं। स्वतंत्रता से पूर्व हम आजादी की लड़ाई के समय एक थे। आजादी के बाद वोट बैंक की राजनीति ने राष्ट्रीयता के क्षरण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। डॉ. नीरद ने कहा कि हमारे देश की धमनियों में राष्ट्रीयता विद्यमान है। आज विकास का दौर है। राष्ट्रीयता व विकास का सह अस्तित्व समय की आवश्यकता है। जरूरी है कि कवि, साहित्यकार भटके देश को रास्ता दिखाएं।

जीएलए विश्वविद्यालय मथुरा के कुलपति प्रो. दुर्ग सिंह चौहान ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारतीय साहित्य कभी संकीर्ण नहीं रहा। संपूर्ण मानवता के हित की बात हमने की है। हम जोड़ने वाले हैं, तोड़ने वाले नहीं। डॉ. बीआर आंबेडकर विवि के पूर्व कुलपति डॉ. गिरीश चंद्र सक्सेना ने कहा कि इस देश में साहित्य सृजन सदैव राष्ट्रीयता से ओतप्रोत रहा है। पूरा विश्व इससे प्रभावित रहा है। आज जरूरी है कि साहित्य के क्षेत्र में बने गिरोह को खत्म कर राष्ट्रीयता का भाव जाग्रत किया जाए।

मुस्लिम व सूफी कवियों ने राष्ट्र की अर्चना की- कें¨हसं के निदेशक प्रो. नंद किशोर पांडेय ने कहा कि भारत के हर काल, हर क्षेत्र, हर भाषा में राष्ट्र अर्चन का साहित्य लिखा गया। राष्ट्र को एक होने का संदेश दिया। अमीर खुसरो से लेकर आगरा के नजीर अकबरावादी तक मुस्लिम व सूफी कवियों ने भी अपने सृजन से राष्ट्र अर्चना की। लगभग एक हजार वर्ष पूर्व पूरे भारत वर्ष में कई सांस्कृतिक आदोलन ऐसे हुए, जिनका प्रभाव राष्ट्रवादी था।

राज्यपाल से सहयोग मांगा- केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष प्रो. कमल किशोर गोयनका ने कहा कि राष्ट्र की सत्ता के लिए साहित्य अनिवार्य है। साहित्यकार का धर्म है कि वो राष्ट्र की आत्मा की रक्षा करे। उन्होंने राज्यपाल से कें¨हसं को अंतरराष्ट्रीय ख्याति का हिंदी शिक्षण शोध केंद्र बनाने में सहयोग की मांग की। दोनों सत्रों में देशभर से आए 150 से अधिक साहित्यकार व शोधार्थी मौजूद रहे। इससे पूर्व संगीतज्ञ गजेंद्र सिंह चौहान के निर्देशन में सरस्वती वंदना व ध्येय गीत प्रस्तुत किया गया। शोध छात्रा डॉ. दीप्ती गुप्ता, रंजीत आरएस, यशपाल निर्मल ने शोध आलेख पढ़े। अंत में राष्ट्रगान गया गया।

कला दर्शन ने किया मंत्रमुग्ध- संस्कार भारती के कलाकारों और कें¨हसं के हिंदीतर भाषी व विदेशी छात्र-छात्राओं ने ताल, वाद्य, संगम और भाव नृत्य की अनूठी प्रस्तुतियों से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

संस्कार भारती के अखिल भारतीय साहित्य संयोजक राज बहादुर सिंह, सह संयोजक अजय अवस्थी, सुभाष अग्रवाल, प्रो. बीना शर्मा, पद्मश्री योगेंद्र बाबा, पूर्व सांसद प्रभुदयाल कठेरिया, विधायक जगन प्रसाद गर्ग, पूर्व कुलसचिव डॉ. राम अवतार शर्मा, बांकेलाल गौड़, डॉ. मधु भारद्वाज, डॉ. शैलबाला, संजीव वशिष्ट, ताहिर सिद्दकी, राकेश निर्मल, आकाश भदौरिया, चंद्रकात कोठे, केशरी नंदन, डॉ. गंगाधर वानोडे, हरी मोहन सिंह कोठिया, जोगेंद्र सिंह मीणा, पदम गौतम आदि उपस्थित थे।

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