सत्ता हस्तांतरण के तरह ही अब घोटाला हस्तांतरण का दौर

Spesal Story

लेखक- प्रोफ़ेसर (डा.) N P Verma के फेसबुक वाल से

अंग्रेज शासक ने भारत की स्वतंत्रता का हस्तांतरण उस समय की सबसे बड़ी और अपनी भरोसेमंद पार्टी कांग्रेस के हाथ की थी। तबसे लम्बे समय तक भारत में कांग्रेस का शासन रहा और अंग्रेजी शासन की नीतियां फलती-फूलती रही।२००५के सितम्बर मैं मैनचेस्टर में दिये एक भाषण में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने बड़े गर्व से स्वीकार किया था कि हमने भारत में अंग्रेजी राज और अंग्रेजी भाषा का सूर्य अस्त नहीं होने दिया है। अंग्रेजी राज में जाति, धर्म और सम्प्रदाय तथा भाषा आदि के नाम पर जनता को बांटने तथा भारत का धन लूट कर विदेश ले जाने का खेल जारी हो गया था। कांग्रेस शासन काल के भारत में वह खेल जारी रहा और उस खेल के उत्तराधिकार की निरंतरता जारी रही। यह सच है कि विजय माल्या, ललित मोदी,नीरव मोदी, मेहुल चौकसी जैसे देश द्रोहियों के कारनामे का उदभेदन भाजपा के शासन काल में हुआ पर यह कडुवा सच भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन देशद्रोहियों को भाग जाने का पर्याप्त अवसर इसी सरकार में मिला। इसलिए भाजपा का यह कहकर पल्ला झाड़ लेना कि यह तो कांग्रेस के समय का है।यह तय बात है कि इतने बड़े पैमाने पर घोटाले कुछ माह और वर्ष में नहीं होते हैं। मीडिया में आई बातों को तार्किक ढंग से परखा जाय तो यह खेल कांग्रेस शासन काल में शुरू हो गया था और जब दूसरे दल को सत्ता मिली तो इस खेल का भी हस्तांतरण हो गया। जैसे कि एक पाकेटमारी जब अपनी सीमा के अंदर अपने शिकार पर हाथ साफ नहीं कर पाता है तब अपने शिकार को दूसरे सीमाधीन वाले के हाथ बेच देता है। इसके अन्तर्सीमाई सम्बन्ध होते हैं। राजनीतिक दलों के बीच भी कुछ ऐसे ही सम्बन्ध होते है। सत्ता परिवर्तन होने पर भी इनके आपसी सम्बन्ध पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसका प्रमाण ये लुटेरे हैं जिनके कांग्रेस से भी सम्बन्ध थे और भाजपा के कुछ लोगों से भी है। तभी तो इतनी बड़ी घटनाओं को अंजाम देकर ये आसानी से विदेश भाग जाते हैं। साधारण व्यक्ति की एअरपोर्ट पर इतनी सघन चेकिंग होती है कि सुई के छेद से ऊंट का पार कर जाना जैसी। यह मुसीबत अभी-अभी दुबई जाने-आने के क्रम में झेल चुका हूं। और कसम खा ली कि दोबारा विदेश नहीं जाउंगा। पर ये घोटालेबाज आराम से भाग जाते हैं । बिना ओझा-गुणी की मदद से सांप के आगे मेढक कूद नहीं सकता है। वर्तमान व्यवस्था में भी पूर्व की व्यवस्था की पुनरावृत्ति हो और अपराधी का बाल बांका नहीं हो तो एक ओर अपराधी का मनोबल बढ़ेगा और दूसरी ओर पार्टी पर से जनता का विश्वास उठ जाएगा। अभी भी जनता में विश्वास है। त्रिपुरा में भाजपा की जीत एक खास दल के प्रति जनता में विकास की आकांक्षा के विश्वास की जीत है न कि विचारधारा की। मूर्ति तोड़े उनमें और कुछ कम्युनिस्टों के घर जला देने के घृणित कार्य से कम्युनिस्ट विचारधारा समाप्त होने के बजाय दृढ़ हुई है।सत्ता से बाहर होने पर भी मानिक सरकार अपनी सादगी और ईमानदारी के लिए श्रद्धा और आदर के पात्र बने हुए हैं। इसका प्रमाण है कि शपथ ग्रहण समारोह में सत्तापक्ष के कुछ मंत्रियों ने शपथ लेने के पूर्व मानिक सरकार के चरणस्पर्श किये। बात बिल्कुल साफ है कि जनता विकास चाहती है पर ईमानदार नेताओं के प्रति उनमें अब भी श्रद्धा-सम्मान है।यह सत्यता पक्ष के लिए आत्मचिंतन का विषय है।

(लेखक- वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक हैं)

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