शिक्षाविद् एवं अप्रतिम वाग्मी जनार्दन प्रसाद झा “द्विज”

साहित्य
छायायुगीन कवि-कहानीकार-आलोचक-चरित्ररेखाकार-शिक्षाविद् जनार्दन प्रसाद झा “द्विज”
आज 5 मई है, अर्थात् छायायुगीन कवि-कहानीकार-आलोचक-चरित्ररेखाकार-शिक्षाविद् एवं अप्रतिम वाग्मी जनार्दन प्रसाद झा “द्विज” की पुण्यतिथि। आज की ही तारीख शाम 7:00 बजे उन्होंने मात्र 60 की आयु में अपनी इहलीला समाप्त की थी। तब वे पूर्णिया महाविद्यालय के प्राचार्य हुआ करते थे। उन्होंने वहीं शतवर्षीय जीर्ण-शीर्ण प्राचार्य-निवास में अंतिम साँसे ली थीं। मधुमेह के कारण पहले काला मोतियाबिंद (ग्लूकोमा) के शिकार हुए, फिर हृदय के रोग के। वाराणसी-जीवन के अंतरंग मित्र कैलाशपति त्रिपाठी की असामयिक मृत्यु ने भी उन्हें झकझोर दिया था। इन तीनों कारणों ने मिलकर जब उन्हें अपना ग्रास बनाया, तब उन्होंने अपने जीवन के मात्र 59 वर्ष 3 माह 11 दिन व्यतीत किये थे। डॉ. लक्ष्मीनारायण सुधांशु तथा पंडित जगन्नाथ मिश्र ने उन्हें बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया। हवाई जहाज से पटने के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ.ए. के.एन. सिन्हा को पूर्णिया ले आए। कहते हैं न, दवा तो रोग की होती है,मृत्यु की नहीं । अपनी मृत्यु का पूर्वाभास उन्हें कई साल पहले ही हो चुका था, अन्यथा 1953 की अवंतिका (पत्रिका) में यह कविता नहीं छपवाई होती-

“दिव्य दीप्ति उसकी भीतर है, बाहर अंधकार का घर है,
हाहाकार भरा मन मेरा, देख उसे अब मन हो रहा।”
लिखना-पढ़ना लगभग छूट गया था। बोलना भी अपेक्षाकृत कम हो गया था। कुछ लोगों ने उनकी इस स्थिति की तुलना विलियम वर्ड्सवर्थ के अंतिम 15 वर्षों में बिताई अवसाद पूर्ण स्थिति से की। लेकिन, दोनों की स्थितियों में बकौल डॉ. रमाकांत पाठक आसमान-जमीन का अंतर था- “वर्ड्सवर्थ अपनी लाज बचाने के लिए चुप हुए थे, द्विज जी अपने मित्रों की लाज बचाने के लिए।वर्ड्सवर्थ समाज को मुँह दिखाने लायक नहीं रह गया था मगर द्विज जी को मुँह दिखाने लायक उनका समाज ही नहीं रह गया था। वर्ड्सवर्थ की कविता मर गई थी। द्विज जी की कविता उनके प्रिय के चरणों पर चढ़ गई थी। वर्ड्सवर्थ से द्विज जी की तुलना की जाती, जबकि उन्होंने भी अहमदनगर कोर्ट-जेल में सोये नेहरू के सिरहाने में बैठकर अंग्रेजी हुकूमत के नाम माफीनामे की चिट्ठी लिखी होती या महात्मा गाँधी का नाम लेकर द्वितीय महायुद्ध के पक्ष में प्रचार किया होता। जो तुलना किये बिना नहीं रह सकते, वे द्विज जी के मौनावल्मबन की तुलना ब्रह्म ऋषि के 1962 के बाद वाले मौन से भी तो कर सकते थे। समसामयिक आलोचकों के द्वारा अनखाये जाने वाले साहित्यकारों में निराला, द्विज या आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री प्रथम या अंतिम साहित्यकार नहीं थे। गोस्वामी तुलसीदास, संत ज्ञानेश्वर और भवभूति को भी उपेक्षा और अपमान का सहन करना पड़ा था।” 
Bahadur Mishra

 इस स्थिति को द्विज जी ने अपनी एक कहानी के पात्र के मुँह से पहले ही स्पष्ट कर दिया था- “याद करना और भूल जाना, जोड़ना और टूटना, मिलना और अलग हो जाना, यह तो संसार का पुराना कायदा है। ‘बिहार प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन के त्रैमासिक पत्र साहित्य'( खंड 2 1936ई.) में उन्होंने ‘जियो और जीने दो’ के नाम से संपादकीय लिखा था।उसका भी भाव यही था। देखिए- “दूसरे को धक्का देकर आगे निकल जाने की, पराये की कीर्ति-समाधि पर अपना कीर्ति-मंदिर स्थापित करने की प्रवृत्ति हम हिंदी वालों में उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि कुछ सच्ची प्रतिभा वाले साहित्य-स्रष्टा धीरे-धीरे साहित्यिक संन्यास ग्रहण करते जा रहे हैं । इसलिए साहित्यिकों को चाहिए कि वे “जियो और जीने दो” के सिद्धांत को अपना मूल मंत्र बनाकर साहित्य की सच्ची सेवा करने में ही सुख का अनुभव करें ।” किंचित शब्दांतर से उन्होंने यही बात अपनी कविता ‘हम गलत राह की राही हैं’ (राष्ट्रसंदेश पूर्णिया 24 नवंबर, 1950) में कही है –
“हम गलत राह के राही हैं
वह कर न रहे जो है करना।
जीना उसको ही मान रहे,
बेमौत जिसे कहते मरना !”
अपने सुधी पाठकों व मित्रों के लिए निवेदन कर दूँ कि 24 जनवरी, 1904 ई. को आर्थिक दृष्टि से विपन्न माता धनावती देवी और पिता पं. उचितलाल झा के दूसरे पुत्र के रुप में चंपानगर से महज 10-12 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित रामपुर डीह नामक गाँव में जन्म लेने वाले जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’ जीवन भर भले ही लक्ष्मी के कोपभाजन रहे हों, पर माँ सरस्वती ने उन पर अपना भरपूर प्यार लुटाया था। रामपुर डीह, कुमैठा, जिलास्कूल भागलपुर(1920-21), काशी विद्यापीठ स्कूल (1922) एवं काशी हिंदी विश्वविद्यालय(1931 में अंग्रेजी से एम. ए., 1933 में हिंदी से एम. ए.) से उत्तरोत्तर शिक्षा प्राप्त करते हुए पहले देवघर हिंदी विद्यापीठ के कुलसचिव बने(1936), पुनः राजेंद्र कॉलेज छपरा के हिंदी विभागाध्यक्ष (1938 से 1944), सच्चिदानंद सिन्हा कॉलेज, औरंगाबाद के प्राचार्य (1944-48) तथा पूर्णिया कॉलेज के प्राचार्य (2अगस्त 1948 से 5 मई 1964 ई.तक)।
जिला स्कूल, भागलपुर में पढ़ाई के दौरान ही वे देश के तत्कालीन अगड़धत्त नेताओं -. दीप नारायण सिंह, राजेंद्र प्रसाद, पंडित मदन मोहन मालवीय, गांधीजी, मोतीलाल नेहरु चित्तरंजन दास प्रभृति के संपर्क में आए। नेताओं के भाषण के पूर्व बालक ‘द्विज’ का भाषण कराया जाता था, ताकि भीड़ के लिए आकर्षण बना रहे। अपनी वक्तृत्व कला के कारण ही सभी नेताओं, खासकर राजेंद्र प्रसाद के सहज स्नेह-पात्र बने। वाराणसी में पढ़ते हुए उन्होंने अपनी वाग्मिता का लोहा सबसे मनवाया। एक अवसर पर प्रिंसिपल ध्रुव ने तो उन्हें अपनी सोने की घड़ी उतार कर दे दी थी।
वाराणसी वास करते हुए प्रेमचंद,जयशंकर प्रसाद प्रभृत्ति के भाजन बने।पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, विनोद शंकर व्यास जैसे साहित्यकार तो उनके सहपाठी ही थे।डॉ. लक्ष्मीनारायण ‘सुधांशु’ उनके अनुजवत थे।
द्विज जी ने जब 1933 में एम.ए. हिंदी की परीक्षा प्रथम वर्ग में पास की, तब प्रेमचंद ने ‘हंस’ के मई अंक में बधाई देते हुए लिखा- “भावुकता के सागर में डुबकी लगाने वाला कवि और कल्पना के आकाश में उड़ने वाला गल्पकार और चरित्र-लेखक परीक्षा-भवन में बैठकर ऐसी असाधारण सफलता प्राप्त कर ले, यह साधारण बात नहीं है। हम इस सफलता पर आप को हृदय से बधाई देते हैं।” ध्यातव्य है कि तबतक उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं; यथा – किसलय( कहानी संग्रह 1929), मालिका (कहानी संग्रह 1930), मृदुदल (कहानी 1932), अनुभूति (काव्य 1933) उनकी अन्य पुस्तकों के नाम हैं—
अंतर्ध्वनि (काव्य 1941), मधुमयी (कहानी 1937), प्रेमचंद की उपन्यास कला (आलोचना 1933) तथा चरित्र-रेखा (रेखाचित्र 1943), कहते हैं, उनके दो अन्य कविता-संग्रह ‘द्विज पद्योद्यान’ (1920 -1923 के बीच रचित कविताओं का संग्रह) तथा ‘आगता’ स्वराज्य उत्तर काल (1962 तक की कविताओं का संकलन) अप्रकाशित रह गए। अब उनका अता-पता भी नहीं है।
द्विज जी उच्च शिक्षा प्राप्त साहित्य विवेक से समृद्ध साहित्यकार थे। प्रेमचंद के मास्टरपीस उपन्यास ‘गोदान’ का वर्तमान नाम द्विज जी ने ही सुझाया था। कथा-सम्राट ने तो उसका नाम गौ-दान कर रखा था। प्रसाद जी की कविता के प्रथम श्रोता और आलोचक अक्सर द्विज जी ही हुआ करते थे। प्रसाद जी के एकमात्र पुत्र रत्नशंकर प्रसाद ने उनका शब्दचित्र यों खींचा है –
प्रशस्त ललाट, बीच से कढ़ी माँग से दोनों ओर संवारे काले चमकीले बाल, पतले ओठों के भीतर मगही पान, सँकरी बाँह का महीन कुर्ता और पतली किनारी की बकुल-पंख-धोती, कान्धा सोती पतली अंडी-चादर जिससे दाहिनी भुजा निकली और एक कंधा खुला- बाईं भुजा चादर से आधी ढँकी, पतली मुर्रीदार छड़ी, पाँवों में काला पंप और मुख पर ही नहीं, आँखों में भी एक वैसी स्मिति का अपनी चंचलता में अचल निवास जो खिलखिलाहट के सरोवर में उतरने के लिए बहाना ढूंढा करती थी – उस रामपुर डीह के दिवंगत पंडित जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’ की अकेली और अपनी वस्तु रही।घंटों की बैठकी में न जाने कितने पान खिलाए होंगे,किंतु, ऐसा भान नहीं था कि कभी ये छवियाँ स्मृतिशेष हो जाएंँगी।”
अपने छोटे कद , लेकिन प्रखर प्रतिभा के कारण अपने मित्रों के बीच ‘लिट्ल डाइनामाइट’, ‘वामन भगवान’ आदि कई उपाख्यों से अभिहित किए जाने वाले द्विजजी सुकवि रामदयाल पाण्डेय के शब्दों में – “परिमाणात्मक दृष्टि से बहुत नहीं लिखा, परंतु गुणात्मक दृष्टि से उनके साहित्य का स्तर बहुत ही ऊँचा रहा। उनके परिचित उन्हें मित्रवत्सल, मित्र-वपु, भी कहा करते थे। उनके निकटस्थ मित्रों में रामधारी सिंह दिनकर, जयनाथ मिश्र, लक्ष्मीनारायण सुधांशु, कैलाशपति त्रिपाठी, विनोद शंकर व्यास प्रभृत्ति थे। ‘दिनकर’अक्सर उनसे मिलने मिलने पूर्णिया जाते। कहते हैं, उन्होंने रश्मिरथी के समापन सहित कई सर्ग उन्हीं के आवास पर लिखे थे। द्विज जी भी उनसे मिलने ‘सिमरिया’ जाते रहे।
द्विज जी अक्खड़ स्वभाव के स्वाभिमानी साहित्यकार थे। इसका परिचय उन्होंने अपने जीवन में डेग-डेग पर दिया। 1936 की बात है। उन दिनों वे देवघर विद्यापीठ में पदस्थापित थे। जसीडीह-गुरुकुल के वार्षिकोत्सव के अवसर पर अपने अध्यक्षीय अपने अध्यक्षीय संबोधन में हास्यरसावतार पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी के हिन्दी के रूदनशील कवियों पर कटाक्ष किया था। द्विजजी कहाँ मानने वाले थे। उन्होंने अपने संक्षिप्त भाषण में पंडित चतुर्वेदी को औकात बता दी – “अध्यक्ष महोदय! क्षमा करें। मैं दो-टूक जवाब देने से चूकता नहीं। जिसे आपलोग कविता के नाम से अभिहित करते हैं, वह यमक-श्लेष-अनुप्रास से अलंकृत ही क्यों न हो, वह इतिवृत्त प्रबोधन उपदेश के रसहीन तथ्यों से संश्लिष्ट भले ही हो, वह कविता नहीं, महज तुकबंदी है। तुकबंदियों का अंबार लगाने वाला सच्चे कवि की संज्ञा का अधिकारी नहीं हो सकता। इसे भूलें नहीं, फरमाइशों पर महान कविता की रचना असंभव है।सच्ची कविता अनुभूति की रसधारा से स्निग्ध हो – कभी अवसाद-विषाद में तो कभी हर्ष-उल्लास में पाठकों को आत्मविभोर कर देती है।”
पंडित चतुर्वेदी ने द्विज जी की कविताओं में वेदना-करुणा, रुदन-क्रंदन को देखकर यह टिप्पणी की थी। देखिए-
” मर मर कर जीना न पड़े माँ
ग्लानि-गरल पीना न पड़े।
शीर्ण-ह्रदय-अंचल को प्रतिपल
रो-रो कर सीना न पड़े।
(अंतर्ध्वनि से) लेकिन, उन्हें उनकी ये पंक्तियां भी पढ़नी चाहिए-
“जिऊँ तभी जब विकल विश्व को
व्यथा व्यालिनी डँसे नहीं
कपट-दशानन अबल सरलता-.
सील को हर हँसे नहीं।”

रखना याद तुम्हारे पाप तुम्हें खाएँगे
देर नहीं है, मौज-मजे के दिन जल्दी जाएँगे।”
(राष्ट्रसंदेश, पूर्णिया, नवंबर,1950)।पुनः, उन्होंने 1955 में एक कविता लिखी, जो ‘धरती’ (पूर्णिया) में छपी –
“धर्म-शक्ति मुझसे लो, तब कुछ कर पाओगे।
दो मुझको श्रम-दान, विभव से भर जाओगे।
नयन गगन से मोड़ गड़ाओगे जब मुझमें,
स्वर्ग अतल से खींच धरातल पर लाओगे।”

कुल मिलाकर ‘द्विज’ की पहचान ‘विश्व-वेदना’ के कवि और ‘परित्यक्ता’, ‘दुखिया’ जैसी कहानियों के संवेदनशील लेखक, अनुशासनप्रिय, शिक्षाविद्, अप्रतिम वक्ता, स्पष्टवादी व स्वाभिमान पुरुष के रूप में ही रही है। आज के इस ह्रासशील समय में उनकी ‘विश्व वेदना’ कविता बरबस याद आती है-

देव! गजब देखो, यह अपनी
दुनिया बदल गई पल भर में!
अश्रु-यज्ञ की धूम घटा से
हाहाकार मचा अंबर में !
हिय है हहर रहा धरणी का,
भय प्रकम्प भीषण भूधर में!
“त्राहि-त्राहि” सुन सिसक रही है
बँधी विवशताएँ घर-घर में !

यह न ज्योति उस मधुर अनल की
जिससे जीवन-स्वर्ण दमकता,
बन बिजली इस अंधकार में
यह तो कोई प्रलय चमकता!
बड़ी जलन है इस ज्वाला में
जलना कोई खेल नहीं है !
इधर देखता हूँ, करुणा से
मानवता का मेल नहीं है !

दानवता की विजय पराजय
मानवता की घोर अनय है!
बात पराये की मत पूछो
हमें, हाय,अपनों का डर है!
विष की प्यास बंधु शोणित से
आज बुझाई यहाँ जा रही!
ऐ मेरे भगवान! बता तो
दुनिया यह अब कहाँ जा रही?
(अंतर्ध्वनि)

समकालीनों की नजर में “द्विज” :

डॉ. रमाकान्त पाठक – “चारित्रिक हठता,तेजस्विता, स्वाभिमान और दो-टूक बेलागपन की स्वच्छता ने “द्विज” जी के जीवन और साहित्य को कभी मलिन नहीं होने दिया और अर्थाभाव के घोर संकट के बावजूद वे कभी किसी के सामने दीन नहीं हुए। उनका यह अटूट स्वावलंबन उनके उन मित्रों को खास तौर पर खलता रहा, जो उन्हें अपना कृपापात्र बनाकर साहित्य में यशस्वी और राजनीति में शक्तिशाली बनने की साद्य असमय में ही पूरी कर लेना चाहते थे।”

केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’- ” Speaking metaphorically most of the poets today are like drummers and trumpeters. They are harpist too, of the Delhi-school who have the advantage of the local observatory to know which way the wind is likely to blow. There are also ‘cringing flames of the larlappa’ style of the Bombay School who are both vocal and instrumental . Choral and orchestral.
But shri Janardan prasad jha “Dwij” cannot be associated with any of these categories or school for the simple reason that when he crossed the Rubicon these distinctions did not exist.
Shri Dwij looks frail but do not sound faint; he is soft but not effeminate or womenish; he is thin and treadlike but not jerry-built or unsustainable he is undersized but can challenge the tallest in stature; His heart pulsates, his mind contemplates and his soul radiates .”

रामदयाल पाण्डेय -. “कवि एवं कथाकार के रूप में उन्हें महाकवि प्रसाद जी और महासंपादक पंडित नंदकिशोर तिवारी जी भी बहुत ऊँचा स्थान देते थे प्रसाद जी तो उनको अपनी कविताओं का प्रथम श्रोता बनाना पसंद करते थे और उनके परामर्शानुसार संशोधन परिवर्तन भी करते थे।”

नंददुलारे वाजपेयी– ” प्रसाद जी के “आँसू” का प्रकाशन सन् 1925 के आसपास हुआ था। तबतक “निराला” और “पंत ही नहीं “प्रभा” के अनेक कवि तथा “कुसुम”, “वियोगी”, “द्विज” आदि छायावादी काव्य-क्षेत्र में में आ चुके थे। इस समय तक छायावाद एक विशिष्ट काव्य-शैली से आगे बढ़कर काव्यान्दोलन का रूप ग्रहण कर चुका था।”

आचार्य शिवपूजन सहाय (1944) – “द्विजजी मूर्तिमान साहित्य हैं । उनके व्यक्तित्व में जो असामान्य माधुर्य है, उनके रहन-सहन में जो कलापूर्ण सौंदर्य है, उनके स्वभाव में जो स्वयंप्रभा स्वाभिमान है, उनकी वाणी में जो अतुल ओजस्विता है, उनके आचरण में जो संयत अनुशासनप्रियता है, वह बिहार की बड़ी अमूल्य संपत्ति है। हिंदी-संसार में भी दृष्टि दौरा कर हम ऐसे आदर्श गुणों की समष्टि अत्यंत ही एकर्थ पाते हैं । उनका कुंदन-सा दमकता हुआ चरित्र उन्हें कितना ऊँचा उठा ले जायेगा, सहसा कहा नहीं जा सकता ।” (शिवपूजन रचनावली : च. खंड में संकलित)

आरसी प्रसाद सिंह – “द्विजजी का स्वाभिमान इतना प्रचंड और दुर्धर्ष था कि वह टूट तो जा सकता था, पर किसी के आगे झुक नहीं सकता था। जो बात उन्हें नापसंद थी, उसके साथ समझौता कर लेना उनके लिए असंभव था। अतः, उन्होंने अंतोगत्वा टूट जाने के लिए अपनी कठोर नियति को राजी कर लिया।”

रामधारी सिंह दिनकर – “वैयक्तिकता छायावाद की सबसे बड़ी स्वभावगत विशेषता थी और उसका रसमय परिपाक द्विज जी की कविताओं में बहुत आरंभ में ही हो चुका था । नई चेतनाओं
को सबसे पहले हृदयंगम कर लेने वालों में “अनुभूति” के कवि का प्रमुख स्थान था। पंत जी की “मौन निमंत्रण” और द्विज जी की “अयि अमर शांति की जननी जलन” कविताएँ हिंदी में कितनी बार और कितने प्रसंगों पर उदृत हुई,यह गिनती के बाहर है। (‘चक्रवाल’ की भूमिका से)

रंजन सूरिदेव— “महाकवि जयशंकर प्रसाद की कथा पद्धति के केंद्रीय भाव की विकास यात्रा के ध्वजवाहको में पांक्तेय कथाकार द्विज जी मूलतः छायावादी चेतना के सुकवि हैं, जिन्हें वक्तृत्व-कला की ओजस्वता शक्ति, ऊर्जस्व समालोचना शक्ति, नैबंधिक पटुता और असाधारण कथा प्रतिभा प्राप्त थी ।

कांतिकुमार जैन – “अपनी कविताओं में “द्विज” छायावादी थे, उनकी कहानियाँ उनके काव्य की ही प्रलंबित छाया है। हाँ, उनकी शैली और शिल्प अवश्य चंडी प्रसाद शर्मा “हृदयेश” या जयशंकर प्रसाद की छायावादी कहानियों की तरह वक्ता प्रधान, अलंकरण-बोझिल और तत्सम बहुल अथवा समास-गुंफित नहीं है। यहाँ वे प्रेमचंद के निकट हैं। संवेदना में प्रसाद और शिल्प में प्रेमचंद के आत्मीय जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’ जैसे कहानीकार हिंदी में अद्वितीय हैं।”

डॉ बहादुर मिश्र

विभागाध्यक्ष

हिन्दी स्नातकोत्तर विभाग

तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के फेसबुक वाल से

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