कश्ती (कविता)

साहित्य
दीपिका महेश्वरी नजीबाबाद बिजनौर

खोज कर….
हुनर को अपने…
बदल डालो…
दुनिया का चलन….
के चुनौतियों को…
देख कर घबराने से…
कुछ हांसिल नही होता…
उतार कर देखो….
कश्ती को अपनी…
समंदर के गहरे पानी में….
के साहिलों पर बैठकर….
गहराई मापने से….
कुछ हांसिल नहीं होता….
भीगने दो..
कश्ती को अपनी…
होंसलों की बारिश में…
के तूफानों से घबराकर….
साहिलों पर लौट जाने से…
कुछ हांसिल नही होता….

क्योंकि….

अक्सर डगमगाते हैं सभी….
मंजिलों पर पहुँचने से पहले…
के कशतियों को….
रवानियां मिलती ही..
मौजों के थपेङो…
के बाद हैं….

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