बांका में दम तोड़ती सरकारी योजना

आपका विचार
सरकार ने तरह-तरह की कई योजनाएं दनादन तो दे डाली लेकिन जमीनी हकीकत क्या है आईए चलते हैं इसे जानने के लिए “चर्चा ए खास” के साथ विशेष मुलाक़ात में वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार ठाकुर के पास। पंकज जी से संक्षिप्त वार्ता आधारित विचार प्रस्तुत है। सरकार ने लोगों को अलग-अलग तरह की कई योजनाएं तो दनादन दे डाली। लेकिन क्या इसे मुर्त रूप देने के लिए जमीनी स्तर पर काम किया गया या नहीं यह देखने वाला कौन है। अब पंकज जी आपको लिए चलते हैं बिहार के बांका जिला,  जहां सरकार की कई योजनाएं दम तोड़ती आपको खुद ब खुद नजर आ जाएंगीं। ये बताते हैं कि सरकार ने जहां स्वच्छता मिशन के तहत शौचालय योजना के लाभुकों को बारह हजार रुपये का अनुदान राशि देती है। यह योजना बिचौलियों के लिए कोई वरदान से कम नहीं। ये बिचौलिया सर्वप्रथम गांव-गांव घूमकर शौचालय के फार्म जमा करते हैं। जबकि इसकी पूर्ण जिम्मेवारी वार्ड की है। इस योजना के तहत कई ग्रामीण ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि पहले हम लोगों से राशन कार्ड का फोटो स्टेट ‘बैंक अकाउंट’ का फोटो स्टेट लेते हैं और फिर हमें शौचालय में खड़े करके फोटो खींचते हैं। जिसके पचास रुपये देने होते हैं। इन सभी प्रक्रिया से गुजरने के बाद यह बिचौलिया आपको खुद बता देंगे कि आपके पैसे कब आपके खाते में आएंगे। इन भोली-भाली जनता को उस बारह हजार में से दो हजार रुपये सीधे बिचौलिया ले ले रहे हैं। कमोवेश बांका के एक वहीं ग्यारह प्रखंड की यही स्थिति है।कमोबेश नल-जल योजना भी दम तोड़ रही है। कहीं टंकी है तो पाइप नहीं, कहीं पाइप है तो टैंक ही नहीं, कई ऐसे गांव हैं जहां लोग आज भी कई योजनाओं से मरहूम हैं।आखिर इन्हें बताये कौन। इधर जब उच्चाधिकारियों से इस संदर्भ में पूछना चाहा तो बाबू ने अपना स्विच ऑफ रखना ही मुनासिब समझा। आखिर हो भी क्यों नहीं। बाबू का क्या, उन्हें तो अच्छी खासी चढ़ावा मिल जाएगी। पिस रही है, बेचारी जनता, अब ऐसे में कितनी विकास की गंगा बह रही है। आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं। जबकि सत्तासीन अपनी उपलब्धियां गिनाने में व्यस्त है। लेकिन लोग समझ-समझ के भी ना समझ हैं। चूंकि इन्हें भी तो बिन मेहनत के सरकारी राशि के लाभ का लालच है। इसमें पिस रही है, तो गरीबी। गरीब तो गरीबी से उबर सकता है, मगर जब गरीबी आ जाय तो अच्छे-अच्छे के होश ठिकाने लग जाते हैं। अब ऐसे में आप कितने इमानदार है, आपकी व्यवस्था कितनी खड़ी उतरती है इस पर, ये कहने और बताने के बजाय एक ही पंक्ति कहूंगा “ए पब्लिक है बाबू  सब जानती है”।