फूल, वनफूल या वन का फूल: पारस

साहित्य

 वरिष्ठ साहित्यकार पारस कुंज (शब्दयात्रा भागलपुर) की प्रस्तुति 
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वनफूल की १२०वीं जयंती (७ फरवरी)

एक संस्मरण : फूल, वनफूल या वन का फूल

—- • स्मृतिशेष हरिलाल कुंज

नजाने क्यों भारत में भारतीय फूलों का यथेष्ट आदर नहीं होता। धनी-मानी व्यक्तियों के बंगले विदेशी फूलों से ही सजते हैं। सदा से ही हमारी दृष्टि में देशी वस्तुओं की अपेक्षा विदेशी का सम्मान अधिक रहा है।
इसके ज्वलन्त उदाहरण माइकेल मधुसूदन दत्त और रविन्द्रनाथ टैगोर आदि हैं। अपने देश की कला और साहित्य को भी हम विदेशी चश्मों से देखकर ही उनका मूल्यांकन किया करते हैं।
न जाने उपर्युक्त विचारों में कब तक उलझा रहता, यदि मन्दिर में आरती के शंख और घंटे न बज उठता। माँ की आरती हो रही थी। कुछ देर के बाद आरती की थाली भक्तों के आगे आई सभी ने आरती ग्रहण की। मैं भी आरती के लिए बढ़ा तभी वर्षों पुरानी स्मृति दिमाग में उभरने लगी।
महाष्टमी की ही रात्रि थी। नगर के फूल नहीं, ‘वनफूल’ अपनी धर्मपत्नी सहित निशापूजा का दर्शन करने देवी-मंडप में पधारे थे। सौभाग्यवश मैं भी उनके साथ था। आज की ही तरह आरती आई। वनफूल जी ने आरती ली और तब उनकी धर्मपत्नी ने भी आगे बढ़कर अत्यंत श्रद्धापूर्वक आरती लेकर दोनों हाथों को अपने नेत्रों से लगाया और फिर न जाने क्यों उन्हीं हाथों को मेरे मस्तक पर फिरा दिया। आनंदातिरेक से मैं गदगद हो उठा। झुक कर उनके चरणों को स्पर्श करना चाहा। पर मुझे रोकती हुई वो बोल उठीं– ” पागल ! माँ वहाँ है … उधर प्रणाम करो! ”
वनफूल जी मेरे पागलपन पर हँसे बिना नहीं रह सके। परन्तु मैं उत्तर दिये बिना नहीं रहा। मैंने कहा– ” वो तो सभी की माँ हैं, और आप हैं केवल मेरी माँ ! ” और पुन: झुक कर चरण-स्पर्श कर लिया।
डॉक्टर बलाईचन्द्र मुखर्जी को नगर के सारे लोग जानते हैं परन्तु ‘वनफूल’ को जानने वालों की संख्या ऊँगलियों पर गिनने योग होगी। वनफूल ठीक वन के फूल की तरह अपनी कुटिया में बैठकर साहित्य सौरभ विखेरता रहा।
वनफूल, लघुकथाओं का सिद्धहस्त रचयिता। वनफूल, व्यंग्य चित्रों का सफल चितेरा। वनफूल, सैकड़ों उपन्यासों का सफल लेखक। वनफूल, ‘रवीन्द्र पुरस्कार’ के विजेता और श्रेष्ठ कथाकार के रूप में भारत सरकार द्वारा सम्मानित।
वनफूल– जिनके उपन्यासों पर अनेक चलचित्रों का निर्माण हुआ और अभी-अभी ‘भुवन सोम’ की प्रसिद्धि आकाश छु रही है।
परन्तु वनफूल अभी भी वन का फूल ही है। वही धोती और साधारण कुरता। चौड़े ओठों पर बच्चों की- सी वही मुस्कान। आत्म-प्रवंचना की कुचेष्टा उन्हें छू तक नहीं गई।
कुछ वर्ष पूर्व नगर की सर्वाधिक सक्रिय संस्था ‘श्री गौरांग संकीर्तन समिति’ ने ‘श्री तुलसी-जयंती-महोत्सव’ में अपने मंच पर सर्वश्री दिनकर, द्विजेन्द्र और वनफूल को आमंत्रित कर त्रिवेणी-संगम का दृश्य प्रस्तुत कर दिया।
उक्त आयोजन की इतनी प्रशंसा हुई कि प्रान्त के समाचार-पत्रों ने कालम के कालम भर दिये। उन सभी समाचार-पत्रों का पुलिंदा लेकर मैं एक दिन वनफूल जी के निवास-स्थल पर गया और उनके कहा– ” डाक्टर साहब ! पत्रों में जयन्ती की खूब प्रशंसा छपी है।  कहिए तो सुनाऊँ ? ”
परन्तु मैंने लक्ष्य किया, मेरी बातों की उनपर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।  मुस्कुराते हुए बोले–
” हरि ! मेरा समाचार-पत्र इन समाचार-पत्रों से भिन्न है। इधर आओ, देखो– कल शाम तक उस गुलाब में कुछ नहीं था और आज कली का दर्शन हो रहा है। तुम नहीं समझोगे न उसके खिलने की कितनी आकुल प्रतिक्षा मुझ में है। आकाश के गहरे नीले रंग की पृष्ठभूमि में छोटा-सा नवागन्तुक उस श्वेत बादल के टुकड़े को देखो। कितना गतिमय ? धरती को खींचने की कितनी उत्कट व्यग्रता ? मैं नित्य इन्हें ही पढ़ता हूँ। ये ही मेरे समाचार-पत्र हैं।”
और हँसते हुए मेरी बाँह पकड़ कर अंदर के बैठकखाने में ले गये।
इसी बैठक-खाने में विश्वविख्यात सत्यजीत रे पधारे और इनके किसी कथानक पर चलचित्र बनाने की अनुमति चाही।
परन्तु मेरे आश्चर्य की सीमा न रही जब श्री वनफूल ने उनके आग्रह को टालते हुए इन्कार कर दिया। बोले– ” मैं आपको अपनी कोई रचना नहीं दूँगा ! क्योंकि आप हम भारतीयों की कमजोरियों को अधिकाधिक प्रकाश में लाते हैं। मुझसे यह सहन नहीं होगा ! ” अब तक यह इन्कार स्वीकार में नहीं बदल सका।
उन दिनों दिनकर जी भागलपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति थे। वे जबतक यहाँ रहे, मेरी ‘चित्रशाला’ में आते रहे। अनेकों बार श्री दिनकर के साथ वनफूल जी और डॉ. बेचन का संयुक्त समागम होता रहा। घंटों साहित्य की चर्चा होती और जब थक जाते तो गोष्ठी समाप्त कर दी जाती। कभी-कभी हमारी यह गोष्ठी श्री वनफूल के निवास पर भी जमती।
एक दिन श्री वनफूल की धर्मपत्नी के आग्रह पर उनके हाथों से बनी खोए की मिठाई और नमकीन खाने के लिए डॉ. बेचन और दिनकर जी के साथ वनफूल जी के निवास-स्थान पर गया।
एक काले-कलूटे छोटे बच्चे ने बैठक का द्वार खोला। वनफूल जी हँसते हुए निकले और उस बच्चे का परिचय देते हुए बोले– ” इस छोकड़े की माँ मर गई है। अब यहीं रहता है। ”
हम लोग सोफे पर बैठ गये नमकीन और चाय आई। वनफूल जी की धर्मपत्नी ने भीतर से ही आवाज दी– ” मिठाई लेकर आ रही हूँ। नमकीन खा ले ! ”
” आपके आदेश का पालन हम बड़ी शीघ्रता से कर रहे हैं। आप यथाशीघ्र पधारे ! ” दिनकर जी ने उसी लहजे में हँसते हुए कहा।
तभी एकाएक मेरी दृष्टि बैठकखाने के मध्यम में रखी सरस्वती की विशाल प्रतिमा पर पड़ी। तत्काल आश्चर्य से पूछ बैठा– ” अरे ! आपने अपने घर में इतनी विशाल पूजा की और हमें सूचना तक नहीं ? ”
” परन्तु सरस्वती की पूजा तो वसंत में होती है। अब तो वैशाख आ गया। आखिर विसर्जन कब करेंगे ? ” इस बार लम्बी चुप्पी के बाद डॉ. बेचन ने वनफूल जी से जिज्ञसा की।
चाय की चुस्की लेते हुए दिनकर जी ने नहले पर दहला दिया– ” अरे भाई ! विसर्जन की तारीख डाक्टर भूल गया होगा ! ”
मेरी चाय में एक चम्मच चीनी और डालते हुए वनफूल जी ने कहा– ” मैं जानता हूँ, तुम चाय में चीनी अधिक लेते हो ! ” फिर सहसा गम्भीर होकर दिनकर जी से बोले– ” दिनकर भाई ! हमलोग तो केवल माँ सरस्वती को पूजना जानते हैं, विसर्जन का ज्ञान नहीं ।” और एकाएक वातावरण भारी हो गया।
इसी बीच नमकीन तथा मिठाइयों से भरी थाली लेकर वनफूल जी की धर्मपत्नी ने प्रवेश किया | अत्यंत स्नेह और आग्रह से वो हमें खिलाने लगीं |
सन्नाटे को तोड़ने का कार्य स्वयं वनफूल जी ने किया | कहने लगे– ” भाई ! इस प्रतिमा की भी एक कहानी है | सुनौगे ? ”
हमलोगों ने मौन स्वीकृति दे दी | सभी के नजरों में जिज्ञसा साकार हो उठी |
” तो सुनो ! और खाते भी जाओ ! एक दिन मैं अपने दवाखाने से लौटा तो देखा मेरा कैक्टस अंगड़ाई ले रहा है | छोटी-छोटी कलियाँ चटखने की चेष्टा कर रही है | तुम तो जानते होगे दिनकर ! कि कैक्टस वर्ष में केवल एक बार फुलता है और वह भी मध्य निशा में | कोई भाग्यशाली ही उसे देख पाते हैं | बस, मैंने तुरन्त ‘चित्रशाला’ में फोन कर हरि को कैमरा सहित बुला-भेजा | फिर तो वह रात कैसी बीती, खुद हरि से ही पूछो ! ”
वनफूल जी एक ही सांस में सारी बातें कहते गये– ” कलकत्ते की कोई भी बंगला पत्रिका ऐसी नहीं जिसमें उस कैक्टस के चित्र न छपे हों |
जरुरत से अधिक अपनी बड़ाई सुनकर मैंने झेंपते हुए कहा– ” डाक्टर साहब ! वह तो आपकी कविता का प्रभाव था जिसने उस चित्र में चार-चाँद लगा दिया ! ”
” अरे पागल ! इस प्रतिमा की कहानी तो रह ही गई | ” दिनकर जी ने बात को विषयान्तर होते देखकर कहा |
” औह ! मैं भी कैसा भुलक्कड़ हूँ | कहता-कहता कहाँ की बात, कहाँ कह गया ! ” भूल सुधारने की चेष्टा करते हुए वनफूल जी फिर कहने लगे– ” इस प्रतिमा की कहानी कुछ यूँ है कि एक दिन मैं ‘चित्रशाला’ गया | साथ में मेरी धर्मपत्नी भी गई | सोचा वहाँ से हरि को लेकर माँ सरस्वती के दर्शन करने चलूँगा | पर, जाने पर मालूम हुआ कि वह ‘कला-केन्द्र’ गया हुआ है, हमलोग भी कला-केन्द्र गये | वहाँ बड़े समारोह से पूजा हो रही थी | मेरी धर्मपत्नी ने प्रतिमा पर पुष्प, अक्षत अर्पित किया | कला-केन्द्र के प्राचार्य श्री बंकिमचंद्र बनर्जी ने देवी का प्रसाद दिया | वहाँ से पुन: लौटा तो देखा कि सरस्वती की उस प्रतिमा के बगल की झाड़ी में एक और प्रतिमा उपेक्षितावस्ता में पड़ी है | बड़ी आश्चर्य और साथ-ही-साथ कूतुहल भी हुआ | मैंने प्राचार्य महोदय से पूछना चाहा | तभी नाटे कद का सोलह-सत्रह की अवस्था का एक युवक सामने आया और घिघियाता-सा बोला–
” प्रणाम सर ! यह प्रतिमा मैंने- बनाई है | ”
मैंने पूछा– ” और वह प्रतिमा, जिसकी पूजा हो रही है ? ”
” वह भी मेरी बनाई है ! मैं यहाँ का एक छात्र हूँ | मेरी एक प्रतिमा केन्द्र की पूजा में काम आ गई और सोचा था यह दूसरी बिक जाती तो कुछ रंग-ब्रश खरीद लेता | ” कहकर वह उदास हो गया |
” मैंने सोचा दिनकर ! कि यह भी कैसी विडम्बना है ? पर तुरन्त उस युवक से कहा– तो क्या हुआ ? यह प्रतिमा मुझे बेच दो ! बिना मेरे आदेश की प्रतीक्षा किये ही मेरी धर्मपत्नी ने बैग से पच्चास रुपये के नोट उसके हाथ में जबरन रख दिया और मेरी ओर घूमकर बेली– बैग में अभी इतना ही था | और तभी से यह प्रतिमा यहाँ पड़ी है | ”
दिनकर जी ने गहरी साँस लेते हुए कहा–
” डाक्टर ! तुम तो पागल हो ही, पर हो बड़े भाग्यशाली क्यों कि तुम्हें पत्नी भी पागली ही मिली है | ”
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