अंगसंस्कृति की विशिष्ट पहचान है मंजूषा कला : उपमहापौर

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सात दिवसीय मंजूषा का हुआ समापन

भागलपुर/संवाददाता। मंजूषा कला को बढ़ावा दिये जाने और मंजूषा कलाकृतियों से जन जन को अवगत कराने के उद्देश्य से आयोजित सात दिवसीय  मंजूषा महोत्सव का समापन हो गया है। स्थानीय सैंडिस कंपाउंड में वस्त्र मंत्रालय भारत सरकार,उद्योग विभाग और उपेंद्र महारथी शिल्प अनुसंधान केंद्र के सौजन्य से आयोजित  इस समापन समारोह को सम्बोधित करते हुए भागलपुर नगर निगम के महापौर राजेश वर्मा ने कहा कि मंजूषा कला अंग जनपद की महत्वपूर्ण धरोहर है। इसने देश के विभिन्न कोनों में अपनी छाप छोड़कर यहां की लोकसंस्कृति को विशिष्ट पहचान दिलायी है। उन्होंने इस कला को विकसित करने में लगे कलाकारों का हौसला अफजाई करते हुए कहा कि इस कला को सफलता के मुकाम तक पहुंचाने के लिए अभी बहुत कुछ करना बांकी है। वहीं  उन्होंने राष्ट्रीय कवि हरिवंश राय बच्चन की एक कविता का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें असफलता से निराश नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे चुनौती के रूप  में स्वीकार कर दूने उत्साह से इसे निखारना चाहिए। कलाकारों की कड़ी मेहनत और लगन की बदौलत ही आज मंजूषा कला जीवंत और लोकप्रिय बनी हुई है।

इस मौके पर शिक्षाविद राजीव कांत मिश्र ने कहा कि कलाकारों का उचित सम्मान और सहयोग करके ही हम इस महत्वपूर्ण कला को समृद्ध और विकसित कर सकते हैं। हमें इसके दर्शन को भी समझने की जरूरत है। वहीं डॉ. अमरेंद्र ने कहा कि मंजूषा लोक कला यहां की लोकगाथा पर आश्रित है। मंजूषा कला के विकास के लिए लोकगाथा को विकसित करना और प्रकाश में लाना आवश्यक है। इसके बल पर ही हम अपनी लोक संस्कृति को जीवंत बनाये रख सकते हैं। वहीं उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कला हमारे पेट से जुड़ा सवाल भी है। इसलिए आज इसमें लगे कलाकारों के सहयोग से मंजूषा कला फलफूल रही है। उलूपी झा ने इसे पौराणिकता से जुड़े जाने की जरूरत पर बल दिया। इस मौके पर कलाकारों को प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया। समारोह को उद्योग विभाग के महाप्रबंधक रमन साह निर्मला देवी अनिता सिंह ने भी सम्बोधित किया। संचालन मंजूषा गुरू मनोज पंडित ने किया।