जब जैसा, तब तैसा।चतुर को लाज कै

सम्पादकीय

संपादकीय 

कौन देशभक्त है और कौन नहीं यह निर्णय करना राजनीतिक दलों का काम नहीं है। क्योंकि राजनीति में कोई नीति नहीं होती है। इसके लिए यह लोकोक्ति सटीक लगती है–“जब जैसा तब तैसा,चतुर को लाज कैसा”। राजनीति और कुछ नहीं सिर्फ चतुराई का खेल है। यह निर्लज्ता की प्रौढ़तम कला है। जिन अपकर्मों की वजह से प्राणी को रौरव नरक में भी जगह नहीं मिलती उन्हें राजनीति में भरपूर अभिनंदन मिलता है। इसलिए किसी राजनीतिक दल से यह अपेक्षा रखना कि वह किसी को देशभक्त होने का प्रमाण पत्र दे सर्वथा अनुचित और देश के लिए खतरनाक साबित होगा। इतिहास गवाह है कि इस देश में हिन्दू और मुसलमान कौमी एकता के लिए दुनिया में अपनी खास पहचान रखते थे। धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर ये एक दूसरे से कभी नहीं लड़े और आज भी दोनों के बीच वहीं सौहार्द है बना हुआ है।शासक वर्ग अपना हित साधने के लिए आपस में लड़ाते रहे हैं। आजादी के पूर्व यह काम अंग्रेज करता था और अब यहां के राजनीतिक दल कर रहे हैं। अंग्रेज अकेला शासक था इसलिए उसके शासन काल में कम दंगे हुए पर आजादी के बाद विविध दलों का शासन हुआ और सत्ता के गणित के हिसाब से अपेक्षाकृत अधिक दंगे हुए। क्योंकि सभी दलों ने मुसलमानों को अपना वोट बैंक समझ रखा है। जिस दल को मुसलमानों का वोट नहीं मिलता वह इनकी देशभक्ति पर फटाक प्रश्न चिन्ह लगा देता है। मुसलमानो में कोई मीरजाफर है तो हिन्दुओं में भी जयचंद की कमी नहीं है। फिर मुसलमानों की देशभक्ति पर ही यह प्रश्र चिन्ह क्यों? मुसलमानो की देशभक्ति की मिसाल आज भी भारत में कायम है। जिस मुसलमान को गो-वध के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है वही मुसलमान सैनिक कारतूस में गाय की चर्बी की अफवाह पर हिन्दू सिपाहियों के समर्थन में उतर आता है। इतना ही नहीं उस समय हमारे स्वतंत्रता सेनानी जब ब्रिटिश शासक से जंग कर रहे थे तब उनके हौसले की आफजाई के लिए क्रांतिकारी और जोशीले नारे लिखने का काम देशभक्त मुसलमान सपूत ही तो कर रहे थे। उस समय के कुछ मशहूर नारे की ओर आपका ध्यानाकर्षण कराना चाहूंगा जिसे लिखने वाले भारत के सपूत मुसलमान ही तो थे।”सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है”जिसे भगतसिंह और उनके साथी गाया करते थे इस जोशीले नारे को१९२१ई०मेंबिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखा था। इस नारे का जोश आज भी कम नहीं हुआ है। सन् १८५७ का पहला स्वाधीनता संग्राम के समय पहले मुस्लिम देशभक्त अज़ीम उल्लाह खान ने”मादरे-वतन भारत की जय”का नारा दिया था। भारत माता की जय उसी का हिंदी रुपान्तरण है। इसी प्रकार”इंकलाब जिंदाबाद”का नारा हसरत मोहानी ने दिया था।”जय हिन्द”का नारा आबिद हसन सफरानी ने दिया था और”भारत छोड़ो”का नारा भारत के मुसलमान सपूत मेहर अली ने दिया था।बन्धु, अब जरा बताइए कि इस राष्ट्र के पिता और चाचा कहे जाने वाले ने कौन सा नारा दिया था जिससे उनको देशभक्त माना जाय और इन मुसलमानों की देशभक्ति पर प्रश्र चिन्ह लगाया जाए। इसीलिए मेरा मानना है कि देश का कोई राजनीतिक दल किसी को देशभक्ति का प्रमाण-पत्र नहीं दे सकता है। यह काम निरपेक्ष भाव से इस देश की जनता ही कर सकती है।गद्दारों की न कोई कौम होती है और न उनका कोई धर्म।आप भी अपने चिंतन के दर्पण में देखने की चेष्टा कीजिए पूरी तस्वीर दिख जाएगी।शुभारात्रि!

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