जल संरक्षण में तालाबों की है महत्वपूर्ण भूमिका

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*अतिक्रमण का शिकार हो रहा संग्रामपुर तालाब*
◆सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरण के लिहाज से है इसकी जरूरत
◆नील की खेती के लिए अंग्रेजों ने कराया था तालाब का निर्माण,

मुंगेर। जल ही जीवन है। जल संरक्षण के लिए हमेशा से तालाबों की जरूरत रही है। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरण के लिहाज से भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। तालाब जल संरक्षण का मजबूत आधार भी है। भूगर्भ विशेषज्ञों द्वारा लगातार जलस्तर में गिरावट आने की बात कही जा रही है। यहां तक कहा जा रहा है कि आने वाले समय में पृथ्वी पर भीषण जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। बावजूद इसके आज बढ़ती जनसंख्या  एवं जनसंख्या के जरुरतों के हिसाब से लोगों ने सामाजिक , सांस्कृतिक एवं पर्यावरण के प्रमुख आधार तालाब को ही अतिक्रमण  कर भवन निर्माण करना शुरू कर दिया है। जिससे दिनों-दिन तालाब संकरी होते जा रही है और तालाब की जमीन पर बहुमंजिली इमारत खड़ी होने लगी है।  लोगों की मानों तो तालाब के अतिक्रमित करने की होड़ लग गई है।जो आज भी जारी है । जिसे खुली आंखों से देखा जा सकता है। बाजजूद स्थानीय प्रशासन धृतराष्ट्र बनी हुई है। यह व्यथा प्रखंड मुख्यालय अवस्थित ब्रिटिश कालीन तालाब है, जो आस पास के किसानों एवं आमलोगों के लिए जीवनदायिनी कहीं जाती थी, अब अपने अस्तित्व बचाने के लिए आंसू बहा रही है।

अतिक्रमण युक्त तालाब

नील की खेती के लिए अंग्रेजों ने कराया था तालाब का निर्माण: ‌‌ –

प्रखंड मुख्यालय स्थित संग्रामपुर बाजार के दक्षिणी छोर पर एक तालाब है,जो संग्रामपुर तालाब के नाम से जाना जाता है। संग्रामपुर प्रखंड को प्राकृतिक वरदान में प्रदत्त बेलहरनी नदी से जुड़ी हुई है। बताते चलें कि अंग्रेजी हुकूमत के समय इस इलाके में नील की खेती कराती जाती थी। बुजुर्गो के कथनानुसार नील की खेती के लिए ही अंग्रेजों द्वारा सात एकड़ के रकबे में इस तालाब का निर्माण करवाया गया था। इस तालाब के पानी का उपयोग नील की खेती के लिए होता था।आज भी तालाब के उत्तरी किनारे पर पम्प हाउस छिन्न भिन्न अवस्था में विराजमान है। जिसपर दबंगों ने कब्जा जमा रखा है।बाजार के सारे  कचरे तालाब किनारे गिराकर धीरे धीरे अतिक्रमण कर रहे हैं।

तालाब के अतिक्रमण की लोगों में लगी है होड़ :- प्रशासनिक उदासीनता एवं स्थानीय लोगों की हठधर्मिता की वजह से  ब्रिटिश कालीन संग्रामपुर तालाब अपना अस्तित्व खोते जा रहा है। तालाब किनारे के लोगों ने एक दूसरे को देख तालाब का अतिक्रमण करना शुरू कर दिया। फिर देखते ही देखते तालाब के अतिक्रमणकारियों में मानो होड़ लग गई। तालाब किनारे के लोगों ने सर्वप्रथम तालाब किनारे कमाऊ शौचालय का निर्माण कराया, जिसकी सारी गंदगी तालाब में गिरने लगी। आज स्थिति यह है कि तालाब के उत्तरी एवं पूर्वी किनारे तालाब के भिंड पर बहुमंजिली इमारत बनाई गई है। जिसका अधिकांश हिस्सा तालाब में है। तालाब के अतिक्रमण का सिलसिला ऐसे चल पड़ा है कि घर एवं बाजार के सारे कचरे तालाब को कुडेदान समझकर डाल देते हैं। जिससे दिनों-दिन तालाब भरता जा रहा है। अब स्थिति यह है कि तालाब में एक बुंद भी पानी नहीं है।

सिमटता जा रहा है। तालाब-सामाजिक एवं सांस्कृतिक धरोहर आज पूरी तरह से जलकुंभियों से भरा पड़ा है। जिसकी सफाई आजतक नहीं कराई जा सकती है। जिससे आदमी के साथ साथ पशुओं को भी परेशानी होती है। प्रशासनिक एवं राजनीतिक उदासीनता की वजह से यह तालाब दिनों-दिन सिमटता जा रहा है।

तालाब में होता था मछली पालन :-

विदित हो कि इस तालाब में मछली पालन होता था।जिससे सरकार को प्रतिवर्ष हजारों रुपये की राजस्व वसूली होती थी। अब मछली पालन तो दूर की बात चैती दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के लिए तालाब में बोरिंग चलाकर पानी भरना पड़ा। तब जाकर प्रतिमा विसर्जन किया गया। बहरहाल अगर समय रहते प्रशासनिक स्तर से इस तालाब का जीर्णोद्धार नहीं कराया गया तो आने वाले कुछ वर्षों में तालाब का  अस्तित्व मिट जायेगा।