Charchaa a Khas
पारो शैवलिनी “कहो पारो कैसे हो। भाभी कैसी है। बच्चे कैसे हैं।” कितनी आत्मीयता थी उनके इस संबोधन में। मैं जब भी उन्हें फोन करता योगेश दा इन्हीं शब्दों से बात शुरू करते थे। अब कभी उनके ये शब्द मेरे कान में नहीं पड़ेंगे। तरसता छोड़ गये सबको, मुझे भी। उनका मधुवन सूना हो गया।
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संतोष कुमार सिंह, संग्रामपुर । पिछले कुछ दिनों से आमलोग आसमान छूते महंगाई की मार झेल रहे हैं। आमलोगों के जुबान पर बस एक बात उभर के आ रही हैं कि अचानक इतनी महंगाई कैसे और क्यों हुई है। आमलोगों को ये तो सिस्टम आयात निर्यात समझ से परे हैं। वो तो सिर्फ रेट देखते
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